Jay MAA Dakshin Kalike

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Jay MAA Dakshin Kalike

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विश्वविजय सरस्वती कवच
सरस्वती ज्ञान, बुद्धि, कला व संगीत की देवी हैं। इनकी उपासना करने से मुर्ख व्यक्ति भी विद्वान बन सकता है। अनेक प्रकार से देवी सरस्वती की पूजा की जाती है। उन्हीं में से एक है विश्वविजय सरस्वती कवच। यह बहुत ही अद्भुत है। विद्यार्थियों के लिए यह विशेष फलदाई है। धर्मशास्त्रों के अनुसार भगवती सरस्वती के इन अदुभुत विश्वविजय सरस्वती कवच को धारण करके ही महर्षि वेदव्यास, ऋष्यश्रृंग, भरद्वाज, देवल तथा जैगीषव्य आदि ऋषियों ने सिद्धि पाई थी। इस कवच को सर्वप्रथम भगवान श्रीकृष्ण ने वृंदावन में रासोत्सव के समय ब्रह्माजी से कहा था। इसके बाद ब्रह्माजी ने गंदमादन पर्वत पर भृगुमुनि को इसे बताया था।
विश्वविजय सरस्वती कवच
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श्रीं ह्रीं सरस्वत्यै स्वाहा शिरो मे पातु सर्वत:।
श्रीं वाग्देवतायै स्वाहा भालं मे सर्वदावतु।।
ऊँ सरस्वत्यै स्वाहेति श्रोत्र पातु निरन्तरम्।
ऊँ श्रीं ह्रीं भारत्यै स्वाहा नेत्रयुग्मं सदावतु।।
ऐं ह्रीं वाग्वादिन्यै स्वाहा नासां मे सर्वतोवतु।
ह्रीं विद्याधिष्ठातृदेव्यै स्वाहा ओष्ठं सदावतु।।
ऊँ श्रीं ह्रीं ब्राह्मयै स्वाहेति दन्तपंक्ती: सदावतु।
ऐमित्येकाक्षरो मन्त्रो मम कण्ठं सदावतु।।
ऊँ श्रीं ह्रीं पातु मे ग्रीवां स्कन्धं मे श्रीं सदावतु।
श्रीं विद्याधिष्ठातृदेव्यै स्वाहा वक्ष: सदावतु।।
ऊँ ह्रीं विद्यास्वरुपायै स्वाहा मे पातु नाभिकाम्।
ऊँ ह्रीं ह्रीं वाण्यै स्वाहेति मम पृष्ठं सदावतु।।
ऊँ सर्ववर्णात्मिकायै पादयुग्मं सदावतु।
ऊँ रागधिष्ठातृदेव्यै सर्वांगं मे सदावतु।।
ऊँ सर्वकण्ठवासिन्यै स्वाहा प्राच्यां सदावतु।
ऊँ ह्रीं जिह्वाग्रवासिन्यै स्वाहाग्निदिशि रक्षतु।।
ऊँ ऐं ह्रीं श्रीं क्लीं सरस्वत्यै बुधजनन्यै स्वाहा।
सततं मन्त्रराजोऽयं दक्षिणे मां सदावतु।।
ऊँ ह्रीं श्रीं त्र्यक्षरो मन्त्रो नैर्ऋत्यां मे सदावतु।
कविजिह्वाग्रवासिन्यै स्वाहा मां वारुणेऽवतु।।
ऊँ सदाम्बिकायै स्वाहा वायव्ये मां सदावतु।
ऊँ गद्यपद्यवासिन्यै स्वाहा मामुत्तरेवतु।।
ऊँ सर्वशास्त्रवासिन्यै स्वाहैशान्यां सदावतु।
ऊँ ह्रीं सर्वपूजितायै स्वाहा चोध्र्वं सदावतु।।
ऐं ह्रीं पुस्तकवासिन्यै स्वाहाधो मां सदावतु।
ऊँ ग्रन्थबीजरुपायै स्वाहा मां सर्वतोवतु।।.....................

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वीर रस के युवा कवि अमित शर्मा जी रचना।

बॉलीवुड में भांड भरे हैं, नीयत सबकी काली है...
इतिहासों को बदल रहे, संजय लीला भंसाली हैं...

चालीस युद्ध जीतने वाले को ना वीर बताया था...
संजय तुमने बाजीराव को बस आशिक़ दर्शाया था...

सहनशीलता की संजय हर बात पुरानी छोड़ चुके...
देश धर्म की खातिर हम कितनी मस्तानी छोड़ चुके...

अपराध जघन्य है तेरा,
दोषी बॉलीवुड सारा है...
इसलिए 'करणी सेना' ने
सेट पर जाकर मारा है...

संजय तुमको मर्द मानता,
जो अजमेर भी जाते तुम...
दरगाह वाले हाजी का भी नरसंहार दिखाते तुम...

सच्चा कलमकार हूँ संजय, दर्पण तुम्हे दिखता हूँ...
जौहर पदमा रानी का,
तुमको आज बताता हूँ...

सुन्दर रूप देख रानी का
बैर लिया था खिलजी ने...
चित्तौड़ दुर्ग का कोना कोना घेर लिया था खिलजी ने...

मांस नोचते गिद्धों से,
लड़ते वो शाकाहारी थे...
मुट्ठी भर थे राजपूत,
लेकिन मुगलों पर भारी थे...

राजपूतों की देख वीरता, खिलजी उसदिन काँप गया...
लड़कर जीत नहीं सकता वो ये सच्चाई भांप गया...

राजा रतन सिंह से बोला, राजा इतना काम करो...
हिंसा में नुकसान सभी का अभी युद्ध विराम करो...

पैगाम हमारा जाकर रानी पद्मावती को बतला दो...
चेहरा विश्व सुंदरी का बस दर्पण में ही दिखला दो...

राजा ने रानी से बोला
रानी मान गयी थी जी...
चित्तौड़ नहीं ढहने दूंगी ये रानी ठान गयी थी जी...

अगले दिन चित्तौड़ में खिलजी सेनापति के संग आया...
समकक्ष रूप चंद्रमा सा पद्मावती ने दिखलाया...

रूप देखकर रानी का खिलजी घायल सा लगता था...
दुष्ट दरिंदा पापी वो पागल पागल सा लगता था...

रतन सिंह थे भोले राजा उस खिलजी से छले गए...
कैद किया खिलजी ने उनको जेलखाने में चले गए...

खिलजी ने सन्देश दिया चित्तौड़ की शान बक्श दूंगा...
मेरी रानी बन जाओ,
राजा की जान बक्श दूंगा...

रानी ने सन्देश लिखा,
मैं तन मन अर्पण करती हूँ...
संग में नौ सौ दासी हैं और स्वयं समर्पण करती हूँ...

सभी पालकी में रानी ने
बस सेना ही बिठाई थी...
सारी पालकी उस दुर्गा ने खिलजी को भिजवाई थी...

सेना भेजकर रानी ने जय जय श्री राम बोल दिया...
अग्नि कुंड तैयार किया था और साका भी खोल दिया...

मिली सूचना सारे सैनिक, मौत के घाट उतार दिए...
और दुष्ट खिलजी ने राजा रतन सिंह भी मार दिए...

मानो अग्नि कुंड की अग्नि उस दिन पानी पानी थी...
सोलह हजार नारियो के संग जलती पदमा रानी थी...

सच्चाई को दिखलाओ,
हम सभी सत्य स्वीकारेंगे...
झूठ दिखाओगे संजय,
तो मुम्बई आकर मारेंगे..ं

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भगवती भद्रकाली के ध्यान
तन्त्रों में भगवती भद्रकाली का ध्यान इस प्रकार दिया गया है –
डिम्भं डिम्भं सुडिम्भं पच मन दुहसां झ प्रकम्पं प्रझम्पं, विल्लं त्रिल्लं
त्रि-त्रिल्लं त्रिखलमख-मखा खं खमं खं खमं खम् ।
गूहं गूहं तु गुह्यं गुडलुगड गुदा दाडिया डिम्बुदेति,
नृत्यन्ती शब्दवाद्यैः प्रलयपितृवने श्रेयसे वोऽस्तु काली ।।”
भद्रकाली के भी दो भेद हैं (१) विपरित प्रत्यंगिरा भद्रकाली तथा (२) षोडश भुजा दुर्गाभद्रकाली । मार्कण्डेय पुराणान्तर्गत दुर्गासप्तशती में जो काली अम्बिका के ललाट से उत्पन्न हुई, वह कालीपुराण से भिन्न हैं । उसका ध्यान इस प्रकार है –
नीलोत्पल-दल-श्यामा चतुर्बाहु समन्विता ।
खट्वांग चन्द्रहासञ्च चिभ्रती दक्षिणकरे ।।
वामे चर्म च पाशञ्च उर्ध्वाधो-भावतः पुनः ।
दधती मुण्डमालाञ्च व्याघ्र-चर्म वराम्बरा ।।
कृशांगी दीर्घदंष्ट्रा च अतिदीर्घाऽति भीषणा ।
लोल-जिह्वा निम्न-रक्त-नयना नादभैरवा ।।
कबन्धवाहना पीनविस्तार श्रवणानना ।।
दक्षिणकाली’ मन्त्र विग्रह हृदय में “प्रलय-कालीन-ध्यान” इस प्रकार है –
क्षुच्छ्यामां कोटराक्षीं प्रलय घन-घटां घोर-रुपां प्रचण्डां,
दिग्-वस्त्रां पिङ्ग-केशीं डमरु सृणिधृतां खड़गपाशाऽभयानि ।
नागं घण्टां कपालं करसरसिरुहैः कालिकां कृष्ण-वर्णां
ध्यायामि ध्येयमानां सकल-सुखकरीं कालिकां तां नमामि ।।
‘महाकाल-संहिता’ के शकारादि विश्वसाम्राज्य श्यामासहस्रनाम में “निर्गुण-ध्यान” इस प्रकार है –
ब्रह्मा-विष्णु शिवास्थि-मुण्ड-रसनां ताम्बूल रक्ताषांबराम् ।
वर्षा-मेघ-निभां त्रिशूल-मुशले पद्माऽसि पाशांकुशाम् ।।
शंखं साहिसुगंधृतां दशभुजां प्रेतासने संस्थिताम् ।
देवीं दक्षिणाकालिकां भगवतीं रक्ताम्बरां तां स्मरे ।।
विद्याऽविद्यादियुक्तां हरविधिनमितांनिष्कलां कालहन्त्रीं,
भक्ताभीष्ट-प्रदात्रीं कनक-निधि-कलांविन्मयानन्दरुपाम् ।
दोर्दण्ड चाप चक्रे परिघमथ शरा धारयन्तीं शिवास्थाम् ।
पद्मासीनां त्रिनेत्रामरुण रुचिमयीमिन्दुचूडां भजेऽहम् ।।
काली-विलास-तंत्र” में कृष्णमाता काली का ध्यान इस प्रकार दिया है –
जटा-जूट समायुक्तां चन्द्रार्द्ध-कृत शेखराम् ।
पूर्ण-चन्द्र-मुखीं देवीं त्रिलोचन समन्विताम् ।।
दलिताञ्जन संकाशां दशबाहु समन्विताम् ।
नवयौवन सम्पन्नां दिव्याभरण भूषिताम् ।।
दिड्मण्डलोज्जवलकरीं ब्रह्मादि परिपूजिताम् ।
वामे शूलं तथा खड्गं चक्रं वाणं तथैव च ।।
शक्तिं च धारयन्तीं तां परमानन्द रुपिणीम् ।
खेटकं पूर्णचापं च पाशमङ्कुशमेव च ।।
घण्टां वा परशुं वापि दक्षहस्ते च भूषिताम् ।
उग्रां भयानकां भीमां भेरुण्डां भीमनादिनीम् ।।
कालिका-जटिलां चैव भैरवीं पुत्रवेष्टिताम् ।
आभिः शक्तिरष्टाभिश्च सहितां कालिकां पराम् ।।
सुप्रसन्नां महादेवीं कृष्णक्रीडां परात् पराम् ।
चिन्तयेत् सततं देवीं धर्मकामार्थ मोक्षदाम् ।।
कादि, हादि, सादि इत्यादि क्रम से कालिका के कई प्रकार के ध्यान हैं । जिस मंत्र के आदि में “क” हैं, वह कादि-विद्या”, जिस मंत्र के आदि में “ह″ है वह हादि-विद्या”, मंत्र में वाग् बीज हो वह “वागादि-विद्या” तथा जिस मंत्र के प्रारम्भ में “हूं” बीज हो वह “क्रोधादि-विद्या” कहलाती है ।
नादिक्रम” में आदि में “नमः” का प्रयोग होता है एवं दादि-क्रम” में मंत्र के आदि में “द” होता है, जैसे दक्षिणे कालिके स्वाहा” । “प्रणवादि-क्रम” में मंत्र प्रारम्भ में “ॐ” का प्रयोग होता है ।
१॰ कादिक्रमोक्त ध्यानम् –
करालवदनां घोरां मुक्तकेशीं चतुर्भुजाम् ।
कालिकां दक्षिणां दिव्यां मुण्डमाला विभूषिताम् ।।
सद्यश्छिन्नशिरः खडगं वामोर्ध्व कराम्बुजाम् ।
अभयं वरदं चैव दक्षिणोर्ध्वाधः पाणिकाम् ।।
महामेघ-प्रभां श्यामां तथा चैव दिगम्बरीम् ।
कण्ठावसक्तमुण्डालीं गलद्-रुधिरं चर्चिताम् ।।
कृर्णावतंसतानीत शव-युग्म भयानकाम् ।
घोरदंष्ट्रां करालास्यां पीनोन्नत-पयोधराम् ।।
शवानां कर-सङ्घातैः कृत-काञ्चीं हसन्मुखीम् ।
सृक्कद्वयगलद् रक्त-धारा विस्फुरिताननाम् ।।
घोर-रावां महा-रौद्रीं श्मशानालय-वासिनीम् ।
बालार्क-मण्डलाकार-लोचन-त्रियान्विताम् ।।
दन्तुरां दक्षिण-व्यापि मुक्तालम्बि कचोच्चयाम् ।
शवरुपं महादेव हृदयोपरि संस्थिताम् ।।
शिवामिर्घोर रावाभिश्चतुर्दिक्षु समन्विताम् ।
महाकालेन च समं विपरित-रतातुराम् ।।
सुखप्रसन्न-वदनां स्मेरानन सरोरुहाम ।
एवं सञ्चिन्तयेत् कालीं सर्वकामार्थ सिद्धिदाम् ।।
२॰ “क्रोध-क्रम” का ध्यान इस प्रकार है –
दीपं त्रिकोण विपुलं सर्वतः सुमनोहराम् ।
कूजत् कोकिला नादाढ्यं मन्दमारुत सेवितम् ।।
भृंङ्गपुष्पलताकीर्ण मुद्यच्चन्द्र दिवाकरम् ।
स्मृत्वा सुधाब्धिमध्यस्थं तस्मिन् माणिक्य-मण्डपे ।।
रत्न-सिंहासने पद्मे त्रिकोणेज्ज्वल कर्णिके ।
पीठे सञ्चिन्तयेत् देवीं साक्षात् त्रैलोक्यसुन्दरीम् ।।
नीलनीरज सङ्काशां प्रत्यालीढ पदास्थिताम् ।
चतुर्भुजां त्रिनयनां खण्डेन्दुकृत शेखराम् ।।
लम्बोदरीं विशालाक्षीं श्वेत-प्रेतासन-स्थिताम् ।
दक्षिणोर्ध्वेन निस्तृंशं वामोर्ध्वनीलनीरजम् ।।
कपालं दधतीं चैव दक्षिणाधश्च कर्तृकाम् ।
नागाष्टकेन सम्बद्ध जटाजूटां सुरार्चिताम् ।।
रक्तवर्तुल-नेत्राश्च प्रव्यक्त दशनोज्जवलाम् ।
व्याघ्र-चर्म-परीधानां गन्धाष्टक प्रलेपिताम् ।।
ताम्बूल-पूर्ण-वदनां सुरासुर नमस्कृताम् ।
एवं सञ्चिनतयेत् कालीं सर्वाभीष्टाप्रदां शिवाम् ।।
३॰ “हादि-क्रम” का ध्यान इस प्रकार है –
देव्याध्यानमहं वक्ष्ये सर्वदेवोऽप शोभितम् ।
अञ्नाद्रिनिभां देवीं करालवदनां शिवाम् ।।
मुण्डमालावलीकीर्णां मुक्तकेशीं स्मिताननाम् ।
महाकाल हृदम्भोजस्थितां पीनपयोधराम् ।।
विपरीतरतासक्तां घोरदंष्ट्रां शिवेन वै ।
नागयज्ञोपवीतां च चन्द्रार्द्धकृत शेखराम् ।।
सर्वालंकार संयुक्तां मुक्तामणि विभूषिताम् ।
मृतहस्तसहस्रैस्तु बद्धकाञ्ची दिगम्बराम् ।।
शिवाकोटि ससहस्रैस्तु योगिनीभिर्विराजजिताम् ।
रक्तपूर्ण मुखाम्भोजां सद्यः पानप्रमम्तिकाम् ।।
सद्यश्छिन्नशिरः खड्ग वामोर्ध्धः कराम्बुजाम् ।
अभयवरदं दक्षोर्ध्वाधः करां परमेश्वरीम् ।।
वह्नयर्क -शशिनेत्रां च रण-विस्फुरिताननाम् ।
विगतासु किशोराभ्यां कृतवर्णावतंसिनीम् ।।
४॰ “वागादि-क्रम” का ध्यान इस प्रकार है –
चतुर्भुजां कृष्णवर्णां मुण्डमाला विभूषिताम् ।
खड्गं च दक्षिणे पाणौ विभ्रतीं सशरं धनुः ।।
मुण्डं च खर्परं चैव क्रमाद् वामे च विभ्रतीम् ।
द्यां लिखन्तीं जटामेकां विभ्रतीं शिरसा स्वयम् ।।
मुण्डमालाधरां शीर्षे ग्रीवायामपि सर्वदा ।
वक्षसा नागहारं तु विभ्रतीं रक्तलोचनाम् ।।
कृष्णवर्णधरां दिव्यां व्याघ्राजिन समन्विताम् ।
वामपादं शवहृदि संस्थाप्य दक्षिणं पदम् ।।
विन्यस्य सिंहपृष्ठे च लेलिहानां शवं स्वयम् ।
सट्टहासां महाशवयुक्तां महाविभीषिणा ।।
एवं विचिन्त्या भक्तैस्तु कालिका परमेश्वरी ।
सततं भक्तियुक्तैस्तु भोगेश्वर्यामभीप्सुभिः ।।
५॰ “नादि-क्रम” का ध्यान –
खड्गं च दक्षिणे पादौ विभ्रतीन्दीवरद्वयम् ।
कर्तृकां खर्परं चैव क्रमाद् भुजयोद्वयं करान्विताम् ।।
६॰ “दादि-क्रम” का ध्यान –
सद्यः कृन्तशिरः खड्गमूर्ध्वद्वय कराम्बुजाम् ।
अभयं वरदंतु भुजयोद्वयं करान्विताम् ।।
७॰ प्रणवादि-क्रम” का ध्यान –
मंत्र के प्रारम्भ में “ॐ” प्रयुक्त होता है, उनका ध्यान कादि-क्रम” के अनुसार करें ।

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काली-सहस्रनाम : श्मशान-कालिका काली भद्रकाली कपालिनी । गुह्य-काली महाकाली कुरु-कुल्ला विरोधिनी ।।१।। कालिका काल-रात्रिश्च महा-काल-नितम्बिनी । काल-भैरव-भार्या च कुल-वत्र्म-प्रकाशिनी ।।२।। कामदा कामिनीया कन्या कमनीय-स्वरूपिणी । कस्तूरी-रस-लिप्ताङ्गी कुञ्जरेश्वर-गामिनी।।३।। ककार-वर्ण-सर्वाङ्गी कामिनी काम-सुन्दरी । कामात्र्ता काम-रूपा च काम-धेनुु: कलावती ।।४।। कान्ता काम-स्वरूपा च कामाख्या कुल-कामिनी । कुलीना कुल-वत्यम्बा दुर्गा दुर्गति-नाशिनी ।।५।। कौमारी कुलजा कृष्णा कृष्ण-देहा कृशोदरी । कृशाङ्गी कुलाशाङ्गी च क्रीज्ररी कमला कला ।।६।। करालास्य कराली च कुल-कांतापराजिता । उग्रा उग्र-प्रभा दीप्ता विप्र-चित्ता महा-बला ।।७।। नीला घना मेघ-नाद्रा मात्रा मुद्रा मिताऽमिता । ब्राह्मी नारायणी भद्रा सुभद्रा भक्त-वत्सला ।।८।। माहेश्वरी च चामुण्डा वाराही नारसिंहिका । वङ्कांगी वङ्का-कंकाली नृ-मुण्ड-स्रग्विणी शिवा ।।९।। मालिनी नर-मुण्डाली-गलद्रक्त-विभूषणा । रक्त-चन्दन-सिक्ताङ्गी सिंदूरारुण-मस्तका ।।१०।। घोर-रूपा घोर-दंष्ट्रा घोरा घोर-तरा शुभा । महा-दंष्ट्रा महा-माया सुदन्ती युग-दन्तुरा ।।११।। सुलोचना विरूपाक्षी विशालाक्षी त्रिलोचना । शारदेन्दु-प्रसन्नस्या स्पुâरत्-स्मेराम्बुजेक्षणा ।।१२।। अट्टहासा प्रफुल्लास्या स्मेर-वक्त्रा सुभाषिणी । प्रफुल्ल-पद्म-वदना स्मितास्या प्रिय-भाषिणी ।।१३।। कोटराक्षी कुल-श्रेष्ठा महती बहु-भाषिणी । सुमति: मतिश्चण्डा चण्ड-मुण्डाति-वेगिनी ।।१४।। प्रचण्डा चण्डिका चण्डी चर्चिका चण्ड-वेगिनी । सुकेशी मुक्त-केशी च दीर्घ-केशी महा-कचा ।।१५।। पे्रत-देही-कर्ण-पूरा प्रेत-पाणि-सुमेखला । प्रेतासना प्रिय-प्रेता प्रेत-भूमि-कृतालया ।।१६।। श्मशान-वासिनी पुण्या पुण्यदा कुल-पण्डिता । पुण्यालया पुण्य-देहा पुण्य-श्लोका च पावनी ।।१७।। पूता पवित्रा परमा परा पुण्य-विभूषणा । पुण्य-नाम्नी भीति-हरा वरदा खङ्ग-पाशिनी ।।१८।। नृ-मुण्ड-हस्ता शस्त्रा च छिन्नमस्ता सुनासिका । दक्षिणा श्यामला श्यामा शांता पीनोन्नत-स्तनी ।।१९।। दिगम्बरा घोर-रावा सृक्कान्ता-रक्त-वाहिनी । महा-रावा शिवा संज्ञा नि:संगा मदनातुरा ।।२०।। मत्ता प्रमत्ता मदना सुधा-सिन्धु-निवासिनी । अति-मत्ता महा-मत्ता सर्वाकर्षण-कारिणी ।।२१।। गीत-प्रिया वाद्य-रता प्रेत-नृत्य-परायणा । चतुर्भुजा दश-भुजा अष्टादश-भुजा तथा ।।२२।। कात्यायनी जगन्माता जगती-परमेश्वरी । जगद्-बन्धुर्जगद्धात्री जगदानन्द-कारिणी ।।२३।। जगज्जीव-मयी हेम-वती महामाया महा-लया । नाग-यज्ञोपवीताङ्गी नागिनी नाग-शायनी ।।२४।। नाग-कन्या देव-कन्या गान्धारी किन्नरेश्वरी । मोह-रात्री महा-रात्री दरुणाभा सुरासुरी ।।२५।। विद्या-धरी वसु-मती यक्षिणी योगिनी जरा । राक्षसी डाकिनी वेद-मयी वेद-विभूषणा ।।२६।। श्रुति-स्मृतिर्महा-विद्या गुह्य-विद्या पुरातनी । चिंताऽचिंता स्वधा स्वाहा निद्रा तन्द्रा च पार्वती ।।२७।। अर्पणा निश्चला लीला सर्व-विद्या-तपस्विनी । गङ्गा काशी शची सीता सती सत्य-परायणा ।।२८।। नीति: सुनीति: सुरुचिस्तुष्टि: पुष्टिर्धृति: क्षमा । वाणी बुद्धिर्महा-लक्ष्मी लक्ष्मीर्नील-सरस्वती ।।२९।। स्रोतस्वती स्रोत-वती मातङ्गी विजया जया । नदी सिन्धु: सर्व-मयी तारा शून्य निवासिनी ।।३०।। शुद्धा तरंगिणी मेधा शाकिनी बहु-रूपिणी । सदानन्द-मयी सत्या सर्वानन्द-स्वरूपणि ।।३१।। स्थूला सूक्ष्मा सूक्ष्म-तरा भगवत्यनुरूपिणी । परमार्थ-स्वरूपा च चिदानन्द-स्वरूपिणी ।।३२।। सुनन्दा नन्दिनी स्तुत्या स्तवनीया स्वभाविनी । रंकिणी टंकिणी चित्रा विचित्रा चित्र-रूपिणी ।।३३।। पद्मा पद्मालया पद्म-मुखी पद्म-विभूषणा । शाकिनी हाकिनी क्षान्ता राकिणी रुधिर-प्रिया ।।३४।। भ्रान्तिर्भवानी रुद्राणी मृडानी शत्रु-मर्दिनी । उपेन्द्राणी महेशानी ज्योत्स्ना चन्द्र-स्वरूपिणी ।।३५।। सूय्र्यात्मिका रुद्र-पत्नी रौद्री स्त्री प्रकृति: पुमान् । शक्ति: सूक्तिर्मति-मती भक्तिर्मुक्ति: पति-व्रता ।।३६।। सर्वेश्वरी सर्व-माता सर्वाणी हर-वल्लभा । सर्वज्ञा सिद्धिदा सिद्धा भाव्या भव्या भयापहा ।।३७।। कर्त्री हर्त्री पालयित्री शर्वरी तामसी दया । तमिस्रा यामिनीस्था न स्थिरा धीरा तपस्विनी ।।३८।। चार्वङ्गी चंचला लोल-जिह्वा चारु-चरित्रिणी । त्रपा त्रपा-वती लज्जा निर्लज्जा ह्नीं रजोवती ।।३९।। सत्व-वती धर्म-निष्ठा श्रेष्ठा निष्ठुर-वादिनी । गरिष्ठा दुष्ट-संहत्री विशिष्टा श्रेयसी घृणा ।।४०।। भीमा भयानका भीमा-नादिनी भी: प्रभावती । वागीश्वरी श्रीर्यमुना यज्ञ-कत्र्री यजु:-प्रिया ।।४१।। ऋक्-सामाथर्व-निलया रागिणी शोभन-स्वरा । कल-कण्ठी कम्बु-कण्ठी वेणु-वीणा-परायणा ।।४२।। वशिनी वैष्णवी स्वच्छा धात्री त्रि-जगदीश्वरी । मधुमती कुण्डलिनी शक्ति: ऋद्धि: सिद्धि: शुचि-स्मिता ।।४३।। रम्भोवैशी रती रामा रोहिणी रेवती मघा । शङ्खिनी चक्रिणी कृष्णा गदिनी पद्मनी तथा ।।४४।। शूलिनी परिघास्त्रा च पाशिनी शाङ्र्ग-पाणिनी । पिनाक-धारिणी धूम्रा सुरभि वन-मालिनी ।।४५।। रथिनी समर-प्रीता च वेगिनी रण-पण्डिता । जटिनी वङ्किाणी नीला लावण्याम्बुधि-चन्द्रिका ।।४६।। बलि-प्रिया महा-पूज्या पूर्णा दैत्येन्द्र-मन्थिनी । महिषासुर-संहन्त्री वासिनी रक्त-दन्तिका ।।४७।। रक्तपा रुधिराक्ताङ्गी रक्त-खर्पर-हस्तिनी । रक्त-प्रिया माँस - रुधिरासवासक्त-मानसा ।।४८।। गलच्छोेणित-मुण्डालि-कण्ठ-माला-विभूषणा । शवासना चितान्त:स्था माहेशी वृष-वाहिनी ।।४९।। व्याघ्र-त्वगम्बरा चीर-चेलिनी सिंह-वाहिनी । वाम-देवी महा-देवी गौरी सर्वज्ञ-भाविनी ।।५०।। बालिका तरुणी वृद्धा वृद्ध-माता जरातुरा । सुभ्रुर्विलासिनी ब्रह्म-वादिनि ब्रह्माणी मही ।।५१।। स्वप्नावती चित्र-लेखा लोपा-मुद्रा सुरेश्वरी । अमोघाऽरुन्धती तीक्ष्णा भोगवत्यनुवादिनी ।।५२।। मन्दाकिनी मन्द-हासा ज्वालामुख्यसुरान्तका । मानदा मानिनी मान्या माननीया मदोद्धता ।।५३।। मदिरा मदिरोन्मादा मेध्या नव्या प्रसादिनी । सुमध्यानन्त-गुणिनी सर्व-लोकोत्तमोत्तमा ।।५४।। जयदा जित्वरा जेत्री जयश्रीर्जय-शालिनी । सुखदा शुभदा सत्या सभा-संक्षोभ-कारिणी ।।५५।। शिव-दूती भूति-मती विभूतिर्भीषणानना । कौमारी कुलजा कुन्ती कुल-स्त्री कुल-पालिका ।।५६।। कीर्तिर्यशस्विनी भूषां भूष्या भूत-पति-प्रिया । सगुणा-निर्गुणा धृष्ठा कला-काष्ठा प्रतिष्ठिता ।।५७।। धनिष्ठा धनदा धन्या वसुधा स्व-प्रकाशिनी । उर्वी गुर्वी गुरु-श्रेष्ठा सगुणा त्रिगुणात्मिका ।।५८।। महा-कुलीना निष्कामा सकामा काम-जीवना । काम-देव-कला रामाभिरामा शिव-नर्तकी ।।५९।। चिन्तामणि: कल्पलता जाग्रती दीन-वत्सला । कार्तिकी कृत्तिका कृत्या अयोेध्या विषमा समा ।।६०।। सुमंत्रा मंत्रिणी घूर्णा ह्लादिनी क्लेश-नाशिनी । त्रैलोक्य-जननी हृष्टा निर्मांसा मनोरूपिणी ।।६१।। तडाग-निम्न-जठरा शुष्क-मांसास्थि-मालिनी । अवन्ती मथुरा माया त्रैलोक्य-पावनीश्वरी ।।६२।। व्यक्ताव्यक्तानेक-मूर्ति: शर्वरी भीम-नादिनी । क्षेमज्र्री शंकरी च सर्व- सम्मोह-कारिणी ।।६३।। ऊध्र्व-तेजस्विनी क्लिन्न महा-तेजस्विनी तथा । अद्वैत भोगिनी पूज्या युवती सर्व-मङ्गला ।।६४।। सर्व-प्रियंकरी भोग्या धरणी पिशिताशना । भयंकरी पाप-हरा निष्कलंका वशंकरी ।।६५।। आशा तृष्णा चन्द्र-कला निद्रिका वायु-वेगिनी । सहस्र-सूर्य संकाशा चन्द्र-कोटि-सम-प्रभा ।।६६।। वह्नि-मण्डल-मध्यस्था सर्व-तत्त्व-प्रतिष्ठिता । सर्वाचार-वती सर्व-देव - कन्याधिदेवता ।।६७।। दक्ष-कन्या दक्ष-यज्ञ नाशिनी दुर्ग तारिणी । इज्या पूज्या विभीर्भूति: सत्कीर्तिब्र्रह्म-रूपिणी ।।६८।। रम्भीश्चतुरा राका जयन्ती करुणा कुहु: । मनस्विनी देव-माता यशस्या ब्रह्म-चारिणी ।।६९।। ऋद्धिदा वृद्धिदा वृद्धि: सर्वाद्या सर्व-दायिनी । आधार-रूपिणी ध्येया मूलाधार-निवासिनी ।।७०।। आज्ञा प्रज्ञा-पूर्ण-मनाश्चन्द्र-मुख्यानुवूâलिनी । वावदूका निम्न-नाभि: सत्या सन्ध्या दृढ़-व्रता ।।७१।। आन्वीक्षिकी दंड-नीतिस्त्रयी त्रि-दिव-सुन्दरी । ज्वलिनी ज्वालिनी शैल-तनया विन्ध्य-वासिनी ।।७२।। अमेया खेचरी धैर्या तुरीया विमलातुरा । प्रगल्भा वारुणीच्छाया शशिनी विस्पुâलिङ्गिनी ।।७३।। भुक्ति सिद्धि सदा प्राप्ति: प्राकम्या महिमाणिमा । इच्छा-सिद्धिर्विसिद्धा च वशित्वीध्र्व-निवासिनी ।।७४।। लघिमा चैव गायित्री सावित्री भुवनेश्वरी । मनोहरा चिता दिव्या देव्युदारा मनोरमा ।।७५।। पिंगला कपिला जिह्वा-रसज्ञा रसिका रसा । सुषुम्नेडा भोगवती गान्धारी नरकान्तका ।।७६।। पाञ्चाली रुक्मिणी राधाराध्या भीमाधिराधिका । अमृता तुलसी वृन्दा वैâटभी कपटेश्वरी ।।७७।। उग्र-चण्डेश्वरी वीर-जननी वीर-सुन्दरी । उग्र-तारा यशोदाख्या देवकी देव-मानिता ।।७८।। निरन्जना चित्र-देवी क्रोधिनी कुल-दीपिका । कुल-वागीश्वरी वाणी मातृका द्राविणी द्रवा ।।७९।। योगेश्वरी-महा-मारी भ्रामरी विन्दु-रूपिणी । दूती प्राणेश्वरी गुप्ता बहुला चामरी-प्रभा ।।८०।। कुब्जिका ज्ञानिनी ज्येष्ठा भुशुंडी प्रकटा तिथि: । द्रविणी गोपिनी माया काम-बीजेश्वरी क्रिया ।।८१।। शांभवी केकरा मेना मूषलास्त्रा तिलोत्तमा । अमेय-विक्रमा व्रूâरा सम्पत्-शाला त्रिलोचना ।।८२।। सुस्थी हव्य-वहा प्रीतिरुष्मा धूम्रार्चिरङ्गदा । तपिनी तापिनी विश्वा भोगदा धारिणी धरा ।।८३।। त्रिखंडा बोधिनी वश्या सकला शब्द-रूपिणी । बीज-रूपा महा-मुद्रा योगिनी योनि-रूपिणी ।।८४।। अनङ्ग - मदनानङ्ग - लेखनङ्ग - कुशेश्वरी । अनङ्ग-मालिनि-कामेशी देवि सर्वार्थ-साधिका ।।८५।। सर्व-मन्त्र-मयी मोहिन्यरुणानङ्ग-मोहिनी । अनङ्ग-कुसुमानङ्ग-मेखलानङ्ग - रूपिणी ।।८६।। वङ्कोश्वरी च जयिनी सर्व-द्वन्द्व-क्षयज्र्री । षडङ्ग-युवती योग-युक्ता ज्वालांशु-मालिनी ।।८७।। दुराशया दुराधारा दुर्जया दुर्ग-रूपिणी । दुरन्ता दुष्कृति-हरा दुध्र्येया दुरतिक्रमा ।।८८।। हंसेश्वरी त्रिकोणस्था शाकम्भर्यनुकम्पिनी । त्रिकोण-निलया नित्या परमामृत-रञ्जिता ।।८९।। महा-विद्येश्वरी श्वेता भेरुण्डा कुल-सुन्दरी । त्वरिता भक्त-संसक्ता भक्ति-वश्या सनातनी ।।९०।। भक्तानन्द-मयी भक्ति-भाविका भक्ति-शज्र्री । सर्व-सौन्दर्य-निलया सर्व-सौभाग्य-शालिनी ।।९१।। सर्व-सौभाग्य-भवना सर्व सौख्य-निरूपिणी । कुमारी-पूजन-रता कुमारी-व्रत-चारिणी ।।९२।। कुमारी-भक्ति-सुखिनी कुमारी-रूप-धारिणी । कुमारी-पूजक-प्रीता कुमारी प्रीतिदा प्रिया ।।९३।। कुमारी-सेवकासंगा कुमारी-सेवकालया । आनन्द-भैरवी बाला भैरवी वटुक-भैरवी ।।९४।। श्मशान-भैरवी काल-भैरवी पुर-भैरवी । महा-भैरव-पत्नी च परमानन्द-भैरवी ।।९५।। सुधानन्द-भैरवी च उन्मादानन्द-भैरवी । मुक्तानन्द-भैरवी च तथा तरुण-भैरवी ।।९६।। ज्ञानानन्द-भैरवी च अमृतानन्द-भैरवी । महा-भयज्र्री तीव्रा तीव्र-वेगा तपस्विनी ।।९७।। त्रिपुरा परमेशानी सुन्दरी पुर-सुन्दरी । त्रिपुरेशी पञ्च-दशी पञ्चमी पुर-वासिनी ।।९८।। महा-सप्त-दशी चैव षोडशी त्रिपुरेश्वरी । महांकुश-स्वरूपा च महा-चव्रेâश्वरी तथा ।।९९।। नव-चव्रेâश्वरी चक्र-ईश्वरी त्रिपुर-मालिनी । राज-राजेश्वरी धीरा महा-त्रिपुर-सुन्दरी ।।१००।। सिन्दूर-पूर-रुचिरा श्रीमत्त्रिपुर-सुन्दरी । सर्वांग-सुन्दरी रक्ता रक्त-वस्त्रोत्तरीयिणी ।।१०१।। जवा-यावक-सिन्दूर -रक्त-चन्दन-धारिणी । त्रिकूटस्था पञ्च-कूटा सर्व-वूâट-शरीरिणी ।।१०२।। चामरी बाल-कुटिल-निर्मल-श्याम-केशिनी । वङ्का-मौक्तिक-रत्नाढ्या-किरीट-मुकुटोज्ज्वला ।।१०३।। रत्न-कुण्डल-संसक्त-स्फुरद्-गण्ड-मनोरमा । कुञ्जरेश्वर-कुम्भोत्थ-मुक्ता-रञ्जित-नासिका ।।१०४।। मुक्ता-विद्रुम-माणिक्य-हाराढ्य-स्तन-मण्डला । सूर्य-कान्तेन्दु-कान्ताढ्य-कान्ता-कण्ठ-भूषणा ।।१०५।। वीजपूर-स्फुरद्-वीज -दन्त - पंक्तिरनुत्तमा । काम-कोदण्डकाभुग्न-भ्रू-कटाक्ष-प्रवर्षिणी ।।१०६।। मातंग-कुम्भ-वक्षोजा लसत्कोक-नदेक्षणा । मनोज्ञ-शुष्कुली-कर्णा हंसी-गति-विडम्बिनी ।।१०७।। पद्म-रागांगदा-ज्योतिर्दोश्चतुष्क-प्रकाशिनी । नाना-मणि-परिस्फूर्जच्दृद्ध-कांचन-वंâकणा ।।१०८।। नागेन्द्र-दन्त-निर्माण-वलयांचित-पाणिनी । अंगुरीयक-चित्रांगी विचित्र-क्षुद्र-घण्टिका ।।१०९।। पट्टाम्बर-परीधाना कल-मञ्जीर-शिंजिनी । कर्पूरागरु-कस्तूरी-कुंकुम-द्रव-लेपिता ।।११०।। विचित्र-रत्न-पृथिवी-कल्प-शाखि-तल-स्थिता । रत्न-द्वीप-स्पुâरद्-रक्त-सिंहासन-विलासिनी ।।१११।। षट्-चक्र-भेदन-करी परमानन्द-रूपिणी । सहस्र-दल - पद्यान्तश्चन्द्र - मण्डल-वर्तिनी ।।११२।। ब्रह्म-रूप-शिव-क्रोड-नाना-सुख-विलासिनी । हर-विष्णु-विरंचीन्द्र-ग्रह - नायक-सेविता ।।११३।। शिवा शैवा च रुद्राणी तथैव शिव-वादिनी । मातंगिनी श्रीमती च तथैवानन्द-मेखला ।।११४।। डाकिनी योगिनी चैव तथोपयोगिनी मता । माहेश्वरी वैष्णवी च भ्रामरी शिव-रूपिणी ।।११५।। अलम्बुषा वेग-वती क्रोध-रूपा सु-मेखला । गान्धारी हस्ति-जिह्वा च इडा चैव शुभज्र्री ।।११६।। पिंगला ब्रह्म-सूत्री च सुषुम्णा चैव गन्धिनी । आत्म-योनिब्र्रह्म-योनिर्जगद-योनिरयोनिजा ।।११७।। भग-रूपा भग-स्थात्री भगनी भग-रूपिणी । भगात्मिका भगाधार-रूपिणी भग-मालिनी ।।११८।। लिंगाख्या चैव लिंगेशी त्रिपुरा-भैरवी तथा । लिंग-गीति: सुगीतिश्च लिंगस्था लिंग-रूप-धृव्â ।।११९।। लिंग-माना लिंग-भवा लिंग-लिंगा च पार्वती । भगवती कौशिकी च प्रेमा चैव प्रियंवदा ।।१२०।। गृध्र-रूपा शिवा-रूपा चक्रिणी चक्र-रूप-धृव्â । लिंगाभिधायिनी लिंग-प्रिया लिंग-निवासिनी ।।१२१।। लिंगस्था लिंगनी लिंग-रूपिणी लिंग-सुन्दरी । लिंग-गीतिमहा-प्रीता भग-गीतिर्महा-सुखा ।।१२२।। लिंग-नाम-सदानंदा भग-नाम सदा-रति: । लिंग-माला-वंâठ-भूषा भग-माला-विभूषणा ।।१२३।। भग-लिंगामृत-प्रीता भग-लिंगामृतात्मिका । भग-लिंगार्चन-प्रीता भग-लिंग-स्वरूपिणी ।।१२४।। भग-लिंग-स्वरूपा च भग-लिंग-सुखावहा । स्वयम्भू-कुसुम-प्रीता स्वयम्भू-कुसुमार्चिता ।।१२५।। स्वयम्भू-पुष्प-प्राणा स्वयम्भू-कुसुमोत्थिता । स्वयम्भू-कुसुम-स्नाता स्वयम्भू-पुष्प-तर्पिता ।।१२६।। स्वयम्भू-पुष्प-घटिता स्वयम्भू-पुष्प-धारिणी । स्वयम्भू-पुष्प-तिलका स्वयम्भू-पुष्प-चर्चिता ।।१२७।। स्वयम्भू-पुष्प-निरता स्वयम्भू-कुसुम-ग्रहा । स्वयम्भू-पुष्प-यज्ञांगा स्वयम्भूकुसुमात्मिका ।।१२८।। स्वयम्भू-पुष्प-निचिता स्वयम्भू-कुसुम-प्रिया । स्वयम्भू-कुसुमादान-लालसोन्मत्त - मानसा ।।१२९।। स्वयम्भू-कुसुमानन्द-लहरी-स्निग्ध देहिनी । स्वयम्भू-कुसुमाधारा स्वयम्भू-वुुâसुमा-कला ।।१३०।। स्वयम्भू-पुष्प-निलया स्वयम्भू-पुष्प-वासिनी । स्वयम्भू-कुसुम-स्निग्धा स्वयम्भू-कुसुमात्मिका ।।१३१।। स्वयम्भू-पुष्प-कारिणी स्वयम्भू-पुष्प-पाणिका । स्वयम्भू-कुसुम-ध्याना स्वयम्भू-कुसुम-प्रभा ।।१३२।। स्वयम्भू-कुसुम-ज्ञाना स्वयम्भू-पुष्प-भोगिनी । स्वयम्भू-कुसुमोल्लास स्वयम्भू-पुष्प-वर्षिणी ।।१३३।। स्वयम्भू-कुसुमोत्साहा स्वयम्भू-पुष्प-रूपिणी । स्वयम्भू-कुसुमोन्मादा स्वयम्भू पुष्प-सुन्दरी ।।१३४।। स्वयम्भू-कुसुमाराध्या स्वयम्भू-कुसुमोद्भवा । स्वयम्भू-कुसुम-व्यग्रा स्वयम्भू-पुष्प-पूर्णिता ।।१३५।। स्वयम्भू-पूजक-प्रज्ञा स्वयम्भू-होतृ-मातृका । स्वयम्भू-दातृ-रक्षित्री स्वयम्भू-रक्त-तारिका ।।१३६।। स्वयम्भू-पूजक-ग्रस्ता स्वयम्भू-पूजक-प्रिया । स्वयम्भू-वन्दकाधारा स्वयम्भू-निन्दकान्तका ।।१३७।। स्वयम्भू-प्रद-सर्वस्वा स्वयम्भू-प्रद-पुत्रिणी । स्वम्भू-प्रद-सस्मेरा स्वयम्भू-प्रद-शरीरिणी ।।१३८।। सर्व-कालोद्भव-प्रीता सर्व-कालोद्भवात्मिका । सर्व-कालोद्भवोद्भावा सर्व-कालोद्भवोद्भवा ।।१३९।। कुण्ड-पुष्प-सदा-प्रीतिर्गोल-पुष्प-सदा-रति: । कुण्ड-गोलोद्भव-प्राणा कुण्ड-गोलोद्भवात्मिका ।।१४०।। स्वयम्भुवा शिवा धात्री पावनी लोक-पावनी । कीर्तिर्यशस्विनी मेधा विमेधा शुक्र-सुन्दरी ।।१४१।। अश्विनी कृत्तिका पुष्या तैजस्का चन्द्र-मण्डला । सूक्ष्माऽसूक्ष्मा वलाका च वरदा भय-नाशिनी ।।१४२।। वरदाऽभयदा चैव मुक्ति-बन्ध-विनाशिनी । कामुका कामदा कान्ता कामाख्या कुल-सुन्दरी ।।१४३।। दुःखदा सुखदा मोक्षा मोक्षदार्थ-प्रकाशिनी । दुष्टादुष्ट-मतिश्चैव सर्व-कार्य-विनाशिनी ।।१४४।। शुक्राधारा शुक्र-रूपा-शुक्र-सिन्धु-निवासिनी । शुक्रालया शुक्र-भोग्या शुक्र-पूजा-सदा-रति:।।१४५।। शुक्र-पूज्या-शुक्र-होम-सन्तुष्टा शुक्र-वत्सला । शुक्र-मूत्र्ति: शुक्र-देहा शुक्र-पूजक-पुत्रिणी ।।१४६।। शुक्रस्था शुक्रिणी शुक्र-संस्पृहा शुक्र-सुन्दरी । शुक्र-स्नाता शुक्र-करी शुक्र-सेव्याति-शुक्रिणी ।।१४७।। महा-शुक्रा शुक्र-भवा शुक्र-वृष्टि-विधायिनी । शुक्राभिधेया शुक्रार्हा शुक्र-वन्दक-वन्दिता ।।१४८।। शुक्रानन्द-करी शुक्र-सदानन्दाभिधायिका । शुक्रोत्सवा सदा-शुक्र-पूर्णा शुक्र-मनोरमा ।।१४९।। शुक्र-पूजक-सर्वस्वा शुक्र-निन्दक-नाशिनी । शुक्रात्मिका शुक्र-सम्पत् शुक्राकर्षण-कारिणी ।।१५०।। शारदा साधक-प्राणा साधकासक्त-रक्तपा । साधकानन्द-सन्तोषा साधकानन्द-कारिणी ।।१५१।। आत्म-विद्या ब्रह्म-विद्या पर ब्रह्म स्वरूपिणी । सर्व-वर्ण-मयी देवी जप-माला-विधायिनी ।।

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॥ कालिका ह्रदय स्त्रोत्र ॥
यह स्त्रोत्र कालिका देवी का ह्रदय है । इस स्तोत्र का पूर्ण श्रद्धा एवं भक्ति भाव से पाठ करने पर देवी अनुग्रह करती है और समस्त कामनाओ की पूर्ति होती है । इस पाठ के प्रभाव से आयु बढती है, सम्मान प्राप्त होता है , सकल शत्रुओ का नाश होता है , सौभाग्य की वृद्धि होती है , भूत प्रेतादि की समस्या का निवारण होता है ।
इस स्तोत्र के सिद्ध हो जाने की स्थिति मे महाकाली साधक की जिह्वा पर विराजमान हो जाती है एवं उसके द्वारा कहा गया वाक्य ब्रह्म वाक्य होता है अर्थात पत्थर की लकीर । वाक सिद्धि के लिए इस स्तोत्र को अवश्य सिद्ध करेँ ।
नित्य 108 पाठ करना चाहिए । कुल 1100 पाठ से सिद्ध होता है ।
स्तोत--
हं हं हं हंस हसी स्मित कह-कह चामुक्त-घोराटट-हासा ।
खं खं खं खड्ग हस्ते त्रिभुवने-निलये कालिका काल-धारी ।
रं रं रं रंग-रंगी प्रमुदित-वदने पिङ्ग-केशी श्मशाने ।
यं रं लं तापनीये भ्रकुटि घट घटाटोप-टङ्कार-जापे ॥
हं हं हंकार-नादं नर-पिशित-मुखी संघिनी साधु देवी ।
ह्रीँ ह्रीं कुष्टमांड-मुण्डी वर वर ज्वालिनी पिंग - केशी कृशांगी ॥
खं खं खं भूत-नाथे किलि किलि किलिके एहि एहि प्रचण्डे ।
ह्रुं ह्रुं ह्रुं भुत नाथे सुर गण नमिते मातरम्बे नमस्ते ॥
भां भां भां भाव भावैर्भय हन हनितं भुक्ति मुक्ति प्रदात्री ।
भीं भीं भीँ भीमकाक्षिगुर्ण गुणित गुहावास भोगी स भोगी ॥
भूं भूँ भूँ भूमि काम्पे प्रलय च निरते तारयन्तं स्व नेत्रे ।
भेँ भेँ भेँ भेदनीये हरतु मम भयं कालिके ! त्वा नमस्ते ॥
॥ अथ फल श्रुतिः ॥
आयुः श्री वर्द्धनीये विपुल रिपु हरे सर्व सौभाग्य हेतुः । श्रीकाली शत्रु नाश सकल सुख करे सर्व कल्याण मूले ॥
भक्तया स्तोत्रंत्रि - सन्ध्यंयदि जपति पमानाशु सिद्धि लभन्ते ।
भूत प्रेतादि रण्ये त्रिभुवन वशिनी रुपिणी भूति युक्ते ॥
॥ श्री काली तंत्रे कालिका ह्रदय स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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॥ अष्टादशशक्तिपीठस्तोत्रम् ॥
लङ्कायां शाङ्करी देवी कामाक्षी काञ्चिकापुरे ।
प्रद्युम्ने शृङ्खलादेवी चामुण्डी क्रौञ्चपट्टणे ॥
अलम्पुरे जोगुलाम्बा श्रीशैले भ्रमराम्बिका ।
कोल्हापुरे महालक्ष्मी माहूर्ये एकवीरिका ॥
उज्जयिन्यां महाकाली पीठिक्यां पुरुहूतिका ।
ओढ्यायां गिरिजादेवी माणिक्या दक्षवाटके ॥
हरिक्षेत्रे कामरूपा प्रयागे माधवेश्वरी ।
ज्वालायां वैष्णवी देवी गया माङ्गल्यगौरिका ॥
वारणस्यां विशालाक्षी काश्मीरेषु सरस्वती ।
अष्टादश सुपीठानि योगिनामपि दुर्लभम् ॥
सायङ्काले पठेन्नित्यं सर्वशत्रुविनाशनम् ।
सर्वरोगहरं दिव्यं सर्वसम्पत्करं शुभम् ॥
इति अष्टादशशक्तिपीठस्तुतिः ।

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पीपल का वृक्ष समाप्त करता है सभी संकट - सभी प्रकार की समस्याओं के समाधान हेतु जानें अपना राशि अनुसार विशेष उपाय
पीपल के वृक्ष द्वारा अपनी समस्याओं को दूर करें…
प्रत्येक नक्षत्र वाले दिन भी इसका विशिष्ट गुण भिन्नता लिए हुए होता है.
भारतीय ज्योतिष शास्त्र में कुल मिला कर 28 नक्षत्रों कि गणना है, तथा
प्रचलित केवल 27 नक्षत्र है उसी के आधार पर प्रत्येक मनुष्य के जन्म के
समय नामकरण होता है. अर्थात मनुष्य का नाम का प्रथम अक्षर किसी ना किसी
नक्षत्र के अनुसार ही होता है. तथा इन नक्षत्रों के स्वामी भी अलग अलग
ग्रह होते है. विभिन्न नक्षत्र एवं उनके स्वामी निम्नानुसार है यहां
नक्षत्रों के स्वामियों के नाम कोष्ठक के अंदर लिख रहा हूँ जिससे आपको
आसानी रहे.
(१)अश्विनी(केतु), (२)भरणी(शुक्र), (३)कृतिका(सूर्य),
(४)रोहिणी(चन्द्र), (५)मृगशिर(मंगल), (६)आर्द्रा(राहू),
(७)पुनर्वसु(वृहस्पति), (८)पुष्य(शनि), (९)आश्लेषा(बुध), (१०)मघा(केतु),
(११)पूर्व फाल्गुनी(शुक्र), (१२)उत्तराफाल्गुनी(सूर्य),
(१३)हस्त(चन्द्र), (१४)चित्रा(मंगल), (१५)स्वाति(राहू),
(१६)विशाखा(वृहस्पति), (१७)अनुराधा(शनि), (१८)ज्येष्ठा(बुध),
(१९)मूल(केतु), (२०)पूर्वाषाढा(शुक्र), (२१)उत्तराषाढा(सूर्य),
(२२)श्रवण(चन्द्र), (२३)धनिष्ठा(मंगल), (२४)शतभिषा(राहू),
(२५)पूर्वाभाद्रपद(वृहस्पति), (२६)उत्तराभाद्रपद(शनि) एवं
(२७)रेवती(बुध)..
ज्योतिष शास्त्र अनुसार प्रत्येक ग्रह 3, 3 नक्षत्रों के स्वामी होते है
.
कोई भी व्यक्ति जिस भी नक्षत्र में जन्मा हो वह उसके स्वामी ग्रह से
सम्बंधित दिव्य प्रयोगों को करके लाभ प्राप्त कर सकता है.
अपने जन्म नक्षत्र के बारे में अपनी जन्मकुंडली को देखें या अपनी
जन्मतिथि और समय व् जन्म स्थान लिखकर भेजे.या अपने विद्वान ज्योतिषी से
संपर्क कर जन्म का नक्षत्र ज्ञात कर के यह सर्व सिद्ध प्रयोग करके लाभ
उठा सकते है.
विभिन्न ग्रहों से सम्बंधित पीपल वृक्ष के प्रयोग निम्न है.
(१) सूर्य:- जिन नक्षत्रों के स्वामी भगवान सूर्य देव है, उन व्यक्तियों
के लिए निम्न प्रयोग है.
(अ) रविवार के दिन प्रातःकाल पीपल वृक्ष की 5 परिक्रमा करें.
(आ) व्यक्ति का जन्म जिस नक्षत्र में हुआ हो उस दिन (जो कि प्रत्येक माह
में अवश्य आता है) भी पीपल वृक्ष की 5 परिक्रमा अनिवार्य करें.
(इ) पानी में कच्चा दूध मिला कर पीपल पर अर्पण करें.
(ई) रविवार और अपने नक्षत्र वाले दिन 5 पुष्प अवश्य चढ़ाए. साथ ही अपनी
कामना की प्रार्थना भी अवश्य करे तो जीवन की समस्त बाधाए दूर होने
लगेंगी.
(२) चन्द्र:- जिन नक्षत्रों के स्वामी भगवान चन्द्र देव है, उन
व्यक्तियों के लिए निम्न प्रयोग है.
(अ) प्रति सोमवार तथा जिस दिन जन्म नक्षत्र हो उस दिन पीपल वृक्ष को सफेद
पुष्प अर्पण करें लेकिन पहले 4 परिक्रमा पीपल की अवश्य करें.
(आ) पीपल वृक्ष की कुछ सुखी टहनियों को स्नान के जल में कुछ समय तक रख कर
फिर उस जल से स्नान करना चाहिए.
(इ) पीपल का एक पत्ता सोमवार को और एक पत्ता जन्म नक्षत्र वाले दिन तोड़
कर उसे अपने कार्य स्थल पर रखने से सफलता प्राप्त होती है और धन लाभ के
मार्ग प्रशस्त होने लगते है.
(ई) पीपल वृक्ष के नीचे प्रति सोमवार कपूर मिलकर घी का दीपक लगाना चाहिए.
(३) मंगल:- जिन नक्षत्रो के स्वामी मंगल है. उन नक्षत्रों के व्यक्तियों
के लिए निम्न प्रयोग है....
(अ) जन्म नक्षत्र वाले दिन और प्रति मंगलवार को एक ताम्बे के लोटे में जल
लेकर पीपल वृक्ष को अर्पित करें.
(आ) लाल रंग के पुष्प प्रति मंगलवार प्रातःकाल पीपल देव को अर्पण करें.
(इ) मंगलवार तथा जन्म नक्षत्र वाले दिन पीपल वृक्ष की 8 परिक्रमा अवश्य करनी चाहिए.
(ई) पीपल की लाल कोपल को (नवीन लाल पत्ते को) जन्म नक्षत्र के दिन स्नान
के जल में डाल कर उस जल से स्नान करें.
(उ) जन्म नक्षत्र के दिन किसी मार्ग के किनारे १ अथवा 8 पीपल के वृक्ष रोपण करें.
(ऊ) पीपल के वृक्ष के नीचे मंगलवार प्रातः कुछ शक्कर डाले.
(ए) प्रति मंगलवार और अपने जन्म नक्षत्र वाले दिन अलसी के तेल का दीपक
पीपल के वृक्ष के नीचे लगाना चाहिए.
(४) बुध:- जिन नक्षत्रों के स्वामी बुध ग्रह है, उन नक्षत्रों से
सम्बंधित व्यक्तियों को निम्न प्रयोग करने चाहिए.
(अ) किसी खेत में जंहा पीपल का वृक्ष हो वहां नक्षत्र वाले दिन जा कर,
पीपल के नीचे स्नान करना चाहिए.
(आ) पीपल के तीन हरे पत्तों को जन्म नक्षत्र वाले दिन और बुधवार को स्नान
के जल में डाल कर उस जल से स्नान करना चाहिए.
(इ) पीपल वृक्ष की प्रति बुधवार और नक्षत्र वाले दिन 6 परिक्रमा अवश्य करनी चाहिए.
(ई) पीपल वृक्ष के नीचे बुधवार और जन्म, नक्षत्र वाले दिन चमेली के तेल
का दीपक लगाना चाहिए.
(उ) बुधवार को चमेली का थोड़ा सा इत्र पीपल पर अवश्य लगाना चाहिए अत्यंत
लाभ होता है.
(५) वृहस्पति:- जिन नक्षत्रो के स्वामी वृहस्पति है. उन नक्षत्रों से
सम्बंधित व्यक्तियों को निम्न प्रयोग करने चाहियें.
(अ) पीपल वृक्ष को वृहस्पतिवार के दिन और अपने जन्म नक्षत्र वाले दिन
पीले पुष्प अर्पण करने चाहिए.
(आ) पिसी हल्दी जल में मिलाकर वृहस्पतिवार और अपने जन्म नक्षत्र वाले दिन
पीपल वृक्ष पर अर्पण करें
(इ) पीपल के वृक्ष के नीचे इसी दिन थोड़ा सा मावा शक्कर मिलाकर डालना या
कोई भी मिठाई पीपल पर अर्पित करें.
(ई) पीपल के पत्ते को स्नान के जल में डालकर उस जल से स्नान करें
(उ) पीपल के नीचे उपरोक्त दिनों में सरसों के तेल का दीपक जलाएं.
(६) शुक्र:- जिन नक्षत्रो के स्वामी शुक्र है. उन नक्षत्रों से सम्बंधित
व्यक्तियों को निम्न प्रयोग करने चाहियें.
(अ) जन्म नक्षत्र वाले दिन पीपल वृक्ष के नीचे बैठ कर स्नान करना.
(आ) जन्म नक्षत्र वाले दिन और शुक्रवार को पीपल पर दूध चढाना.
(इ) प्रत्येक शुक्रवार प्रातः पीपल की 7 परिक्रमा करना.
(ई) पीपल के नीचे जन्म नक्षत्र वाले दिन थोड़ासा कपूर जलाना.
(उ) पीपल पर जन्म नक्षत्र वाले दिन 7 सफेद पुष्प अर्पित करना.
(ऊ) प्रति शुक्रवार पीपल के नीचे आटे की पंजीरी सालना.
(७) शनि:- जिन नक्षत्रों के स्वामी शनि है. उस नक्षत्रों से सम्बंधित
व्यक्तियों को निम्न प्रयोग करने चाहिए.
(अ) शनिवार के दिन पीपल पर थोड़ा सा सरसों का तेल चडाना.
(आ) शनिवार के दिन पीपल के नीचे तिल के तेल का दीपक जलाना.
(इ) शनिवार के दिन और जन्म नक्षत्र के दिन पीपल को स्पर्श करते हुए उसकी
एक परिक्रमा करना.
(ई) जन्म नक्षत्र के दिन पीपल की एक कोपल चबाना.
(उ) पीपल वृक्ष के नीचे कोई भी पुष्प अर्पण करना.
(ऊ) पीपल के वृक्ष पर मिश्री चडाना.
(८) राहू:- जिन नक्षत्रों के स्वामी राहू है, उन नक्षत्रों से सम्बंधित
व्यक्तियों को निम्न प्रयोग करने चाहिए.
(अ) जन्म नक्षत्र वाले दिन पीपल वृक्ष की 21 परिक्रमा करना.
(आ) शनिवार वाले दिन पीपल पर शहद चडाना.
(इ) पीपल पर लाल पुष्प जन्म नक्षत्र वाले दिन चडाना.
(ई) जन्म नक्षत्र वाले दिन पीपल के नीचे गौमूत्र मिले हुए जल से स्नान करना.
(उ) पीपल के नीचे किसी गरीब को मीठा भोजन दान करना.
(९) केतु:- जिन नक्षत्रों के स्वामी केतु है, उन नक्षत्रों से सम्बंधित
व्यक्तियों को निम्न उपाय कर अपने जीवन को सुखमय बनाना चाहिए.
(अ) पीपल वृक्ष पर प्रत्येक शनिवार मोतीचूर का एक लड्डू या इमरती चडाना.
(आ) पीपल पर प्रति शनिवार गंगाजल मिश्रित जल अर्पित करना.
(इ) पीपल पर तिल मिश्रित जल जन्म नक्षत्र वाले दिन अर्पित करना.
(ई) पीपल पर प्रत्येक शनिवार सरसों का तेल चडाना.
(उ) जन्म नक्षत्र वाले दिन पीपल की एक परिक्रमा करना.
(ऊ) जन्म नक्षत्र वाले दिन पीपल की थोडीसी जटा लाकर उसे धूप दीप दिखा कर
अपने पास सुरक्षित रखना.
इस प्रकार से प्रत्येक व्यक्ति उपरोक्त उपाय अपने अपने नक्षत्र के अनुसार
करके अपने जीवन को सुगम बना सकते है, इन उपायों को करने से तुरंत लाभ
प्राप्य होता है और जीवन में किसी भी प्रकार की बाधा उत्पन्न नहीं होती
है और जो बाधा हो वह तत्काल दूर होने लगती है. शास्त्र, आदि सभी महान
ग्रन्थ अनुसार पीपल वृक्ष में सभी देवी देवताओं का वास होता है. उन्हीं
को हम अपने जन्म नक्षत्र अनुसार प्रसन्न करते है. और आशीर्वाद प्राप्त
करते है

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जाप माला की संस्कार विधि :-

साधक सर्वप्रथम स्नान आदि से शुद्ध हो कर अपने पूजा गृह में पूर्व या उत्तर की ओर मुह कर आसन पर बैठ जाए अब सर्व प्रथम आचमन - पवित्रीकरण करने के बाद गणेश -गुरु तथा अपने इष्ट देव/ देवी का पूजन सम्पन्न कर ले-

तत्पश्चात पीपल के 09 पत्तो को भूमि पर अष्टदल कमल की भाती बिछा ले - एक पत्ता मध्य में तथा शेष आठ पत्ते आठ दिशाओ में रखने से अष्टदल कमल बनेगा - इन पत्तो के ऊपर आप माला को रख दे -

अब अपने समक्ष पंचगव्य तैयार कर के रख ले किसी पात्र में और उससे माला को प्रक्षालित ( धोये ) करे -

आप सोचेगे कि पंचगव्य क्या है ?

तो जान ले गाय का दूध , दही , घी , गोमूत्र , गोबर यह पांच चीज गौ का ही हो उसको पंचगव्य कहते है पंचगव्य से माला को स्नान करना है - स्नान करते हुए अं आं इत्यादि सं हं पर्यन्त समस्त स्वर वयंजन का उच्चारण करे -

फिर समस्य़ा हो गयी यहाँ कि यह अं आं इत्यादि सं हं पर्यन्त समस्त स्वर वयंजन क्या है ? तो अब नोट कर ले -

ॐ अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ऋृं लृं लॄं एं ऐं ओं औं अं अः कं खं गं घं ङं चं छं जं झं ञं टं ठं डं ढं णं तं थं दं धं नं पं फं बं भं मं यं रं लं वं शं षं सं हं क्षं !!

यह उच्चारण करते हुए माला को पंचगव्य से धोले ध्यान रखे इन समस्त स्वर का अनुनासिक उच्चारण होगा -

माला को पंचगव्य से स्नान कराने के बाद निम्न मंत्र बोलते हुए माला को जल से धो ले -

ॐ सद्यो जातं प्रद्यामि सद्यो जाताय वै नमो नमः
भवे भवे नाति भवे भवस्य मां भवोद्भवाय नमः !!

अब माला को साफ़ वस्त्र से पोछे और निम्न मंत्र बोलते हुए माला के प्रत्येक मनके पर चन्दन- कुमकुम आदि का तिलक करे -

ॐ वामदेवाय नमः
जयेष्ठाय नमः
श्रेष्ठाय नमो रुद्राय नमः
कल विकरणाय नमो बलविकरणाय नमः
बलाय नमो बल प्रमथनाय नमः
सर्वभूत दमनाय नमो मनोनमनाय नमः !!

अब धूप जला कर माला को धूपित करे और मंत्र बोले -

ॐ अघोरेभ्योथघोरेभ्यो घोर घोर तरेभ्य: सर्वेभ्य: सर्व शर्वेभया नमस्ते अस्तु रुद्ररूपेभ्य:

अब माला को अपने हाथ में लेकर दाए हाथ से ढक ले और निम्न ईशान मंत्र का 108 बार जप कर उसको अभिमंत्रित करे -

ॐ ईशानः सर्व विद्यानमीश्वर सर्वभूतानाम ब्रह्माधिपति ब्रह्मणो अधिपति ब्रह्मा शिवो मे अस्तु सदा शिवोम !!

अब साधक माला की प्राण -प्रतिष्ठा हेतु अपने दाय हाथ में जल लेकर विनियोग करे -

ॐ अस्य श्री प्राण प्रतिष्ठा मंत्रस्य ब्रह्मा विष्णु रुद्रा ऋषय: ऋग्यजु:सामानि छन्दांसि प्राणशक्तिदेवता आं बीजं ह्रीं शक्ति क्रों कीलकम अस्मिन माले प्राणप्रतिष्ठापने विनियोगः !!

अब माला को बाय हाथ में लेकर दाय हाथ से ढक ले और निम्न मंत्र बोलते हुए ऐसी भावना करे कि यह माला पूर्ण चैतन्य व शक्ति संपन्न हो रही है -

ॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हों ॐ क्षं सं सः ह्रीं ॐ आं ह्रीं क्रों अस्य मालाम प्राणा इह प्राणाः !
ॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हों ॐ क्षं सं हं सः ह्रीं ॐ आं ह्रीं क्रों अस्य मालाम जीव इह स्थितः !
ॐ आं ह्रीं क्रों यं रं लं वं शं षं सं हों ॐ क्षं सं हं सः ह्रीं ॐ आं ह्रीं क्रों अस्य मालाम सर्वेन्द्रयाणी वाङ् मनसत्वक चक्षुः श्रोत्र जिह्वा घ्राण प्राणा इहागत्य इहैव सुखं तिष्ठन्तु स्वाहा !
ॐ मनो जूतिजुर्षतामाज्यस्य बृहस्पतिरयज्ञमिमन्तनो त्वरिष्टं यज्ञं समिमं दधातु विश्वे देवास इह मादयन्ताम् ॐ प्रतिष्ठ !!

अब माला को अपने मस्तक से लगा कर पूरे सम्मान सहित स्थान दे - इतने संस्कार करने के बाद माला जप करने योग्य शुद्ध तथा सिद्धिदायक होती है -

नित्य जप करने से पूर्व माला का संक्षिप्त पूजन निम्न मंत्र से करने के उपरान्त जप प्रारम्भ करे -

ॐ अक्षमालाधिपतये सुसिद्धिं देहि देहि
सर्व मंत्रार्थ साधिनी साधय-साधय
सर्व सिद्धिं परिकल्पय मे स्वाहा !
ऐं ह्रीं अक्षमालिकायै नमः !

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महाकाल स्तोत्रं :-
इस स्तोत्र को भगवान् महाकाल ने खुद
भैरवी को बताया था.
इसकी महिमा का जितना वर्णन किया जाये कम है.
इसमें भगवान् महाकाल के विभिन्न नामों का वर्णन
करते हुए उनकी स्तुति की गयी है .
शिव भक्तों के लिए
यह स्तोत्र वरदान स्वरुप है . नित्य एक बार जप
भी साधक के अन्दर शक्ति तत्त्व और वीर तत्त्व
जाग्रत
कर देता है . मन में प्रफुल्लता आ जाती है . भगवान्
शिव की साधना में यदि इसका एक बार जप कर
लिया जाये तो सफलता की सम्भावना बड जाती है .
ॐ महाकाल महाकाय महाकाल जगत्पते
महाकाल महायोगिन महाकाल नमोस्तुते
महाकाल महादेव महाकाल महा प्रभो
महाकाल महारुद्र महाकाल नमोस्तुते
महाकाल महाज्ञान महाकाल तमोपहन
महाकाल महाकाल महाकाल नमोस्तुते
भवाय च नमस्तुभ्यं शर्वाय च नमो नमः
रुद्राय च नमस्तुभ्यं पशुना पतये नमः
उग्राय च नमस्तुभ्यं महादेवाय वै नमः
भीमाय च नमस्तुभ्यं मिशानाया नमो नमः
ईश्वराय नमस्तुभ्यं तत्पुरुषाय वै नमः
सघोजात नमस्तुभ्यं शुक्ल वर्ण नमो नमः
अधः काल अग्नि रुद्राय रूद्र रूप आय वै नमः
स्थितुपति लयानाम च हेतु रूपआय वै नमः
परमेश्वर रूप स्तवं नील कंठ नमोस्तुते
पवनाय नमतुभ्यम हुताशन नमोस्तुते
सोम रूप नमस्तुभ्यं सूर्य रूप नमोस्तुते
यजमान नमस्तुभ्यं अकाशाया नमो नमः
सर्व रूप नमस्तुभ्यं विश्व रूप नमोस्तुते
ब्रहम रूप नमस्तुभ्यं विष्णु रूप नमोस्तुते
रूद्र रूप नमस्तुभ्यं महाकाल नमोस्तुते
स्थावराय नमस्तुभ्यं जंघमाय नमो नमः
नमः उभय रूपा भ्याम शाश्वताय नमो नमः
हुं हुंकार नमस्तुभ्यं निष्कलाय नमो नमः
सचिदानंद रूपआय महाकालाय ते नमः
प्रसीद में नमो नित्यं मेघ वर्ण नमोस्तुते
प्रसीद में महेशान दिग्वासाया नमो नमः
ॐ ह्रीं माया - स्वरूपाय सच्चिदानंद तेजसे
स्वः सम्पूर्ण मन्त्राय सोऽहं हंसाय ते नमः
फल श्रुति
इत्येवं देव देवस्य मह्कालासय भैरवी
कीर्तितम पूजनं सम्यक सधाकानाम सुखावहम

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